मस्कुलर डिस्ट्रॉफी बीमारी से पीड़ित बच्चों को उपचार दिलाने के लिए मजबूर माता पिता खा रहे हैं, दर-दर की ठोकरे

विश्व में प्रति दो हजार में से एक बच्चा डी एम डी डचेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी (पेशीय दुर्विकास) नामक गंभीर अनुवांशिक बीमारी से ग्रसित है. इससे पीड़ितों बच्चो की संख्या मध्य प्रदेश में 10-15 हजार एवं समूचे देश में 15 लाख है. इस बीमारी में कमर के नीचे का भाग काम नहीं करता है, वह कुर्सी या बिस्तर पर ही लेटा रहता है. इसमें लगभग 80 प्रकार की बीमारियां शामिल है.

मस्कुलर डिस्ट्रॉफी एक माँ के लिए अभिशाप माना गया है

मां बनना बड़े सौभाग्य की बात मानी जाती है, कहते हैं जो औरत मां नहीं बन पाती वह पूरी नहीं हो पाती, उसका जीवन अधूरा रह जाता है. वो महिलाएं बच्चे के लिए तरस जाती है. जब भी कोई कपल दुनिया में एक बच्चे का स्वागत करता है तो वो हमेशा उनकी टॉप प्रायोरिटी उनका बच्चा बन जाता है. अपने बच्चे की देखभाल के लिए दोनों काफी मेहनत करते हैं. अपनी नींद से लेकर अपना वक्त सब बच्चे के लिए कुर्बान करते हैं.

लेकिन अगर उसी बच्चे को कोई बीमारी हो जाये और डॉक्टर कह दे इसका विश्व में कोई इलाज नहीं है, जाओ बच्चे को खुश रखो इसका कुछ सालो का ही जीवन है. तो सोचो उस माँ की क्या हालत होगी. मानो उसके तो पाँव तले जमीन ही खिसक गई हो. जिस बेटे को उसकी मां हमेशा काला टीका लगाती थी, ताकि उसे किसी की नजर न लगे उसकी जिंदगी को ही मानो नजर लग गई हो. मस्कुलर डिस्ट्रॉफी नामक कोई जानलेवा बीमारी सामने आजाये तो मरने के सिवा और कोई रास्ता नजर नहीं आता है.

जानिए पीड़ित बच्चे की माँ का दर्द

अगर दुनिया में खुशियों की दुकान होती और मुझे उसकी पहचान होती तो में तेरे लिए हर ख़ुशी खरीद लेती भले ही उसकी कीमत मेरी जान होती“. रात दिन सोते जागते उसका ही ख्याल रहता है वह अपनी मर्जी से हाथ नहीं हिला सकता. रात में सोने के बाद बार बार देखना पड़ता है की कही वो आवाज तो नहीं लगा रहा , कही उसके हाथ पैर इधर उधर तो नहीं करने है, कही करवट तो नहीं दिलाना है, कही उसे सांस लेने में तकलीफ तो नहीं हो रही है .

क्या है डी एम डी मस्कुलर डिस्ट्रॉफी नामक बीमारी

डी एम डी मस्कुलर डिस्ट्रॉफी नामक बीमारी में पीड़ित बच्चा 8-10 वर्ष की आयु में आते आते व्हील चेयर पे आ जाता है. 18- 20 की उम्र में वेंटिलेटर एवं 23-27 वर्ष की आयु में मौत हो जाती है. यह एक अनुवांशिक बीमारी है. इसमें मांसपेशिया धीरे धीरे इतनी कमजोर हो जाती है वे काम करना बंद कर देती है. यह बीमारी 5-6 वर्ष के बाद ज्यादातार लड़को में होती है. इस बीमारी ने बच्चो को इस तरह अपने जाल में जकड लिया है की पल पल घुट घुट कर जी रहा है.

जो उम्र बढ़ने के साथ-साथ पूरे शरीर में फैलती चली जाती है, इससे रोगी को अपना संतुलन बनाने में दिक्कत आती है, बिना सहारे खड़ा होकर चल फिर भी नहीं पता है, पीठ के बल भी बैठने में परेशानी होती है. धीरे धीरे रीढ़ की हड्डियां झुकने लगती है. हृदय संबंधित रोग भी हो जाते है बाद में रोगी की मौत हो जाती है.

शासन प्रशासन से उपचार के लिए गुहार

अभिभावक इलाज के लिए दर दर भटक रहे है. ऐसे में छीपाबड़ निवासी सुरेंद्र जी मीणा अभी तक केंद्रीय स्वास्थ मंत्री डॉ हर्ष वर्धन सिंह, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, मुख्यमंत्री शिव राज सिंह चौहान, भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय, कृषि मंत्री कमल पटेल एवं मध्य प्रदेश स्वास्थ मंत्री प्रभु राम चौधरी से अपने बच्चे को उपचार दिलाने के लिए गुहार लगा चुके है. मगर सरकार कोई सुध नहीं ले रही है.

3.09% बच्चों के परिजनों ने इच्छामृत्यु की मंजूरी मांगी

3.09% मरीज मांग रहे है इच्छामृत्यु उनके जीने की इच्छा ख़तम हो गई है. लाइलाज बीमारी से परेशान बच्चों के परिजनों ने जन सुनवाई में अधिकारियों को आवेदन देकर इच्छामृत्यु मांगी कहा इलाज कराओ नहीं तो इच्छामृत्यु की मंजूरी दो.

बीमारी को प्रधानमंत्री आयुष्मान योजना में शामिल करने की मांग रखी गई है

इस बीमारी का भारतवर्ष में इलाज उपलब्ध नहीं है. केवल अमेरिका और यूरोप के कुछ देशो में इसकी दवा मिलती है. भारत के दवा वैज्ञानिक इस दवा का पैटर्न करने के लिए तैयार है, मगर भारत सरकार से अनुमति लेने व जरुरी सुविधा न होने से वे आगे नहीं आ पा रहे है. इस दिशा में पहल कर दवा बनाने के लिए कोलकत्ता के वैज्ञानिक सुरजीत सिन्हा, बैंगलोर के डॉ अरका घोष एवं डॉ आनंद सागर को मदद दी जाए ताकि मानव कल्याण की दिशा में बड़ी पहल की जा सके

इस बीमारी का उपचार अमेरिका में जीन थेरैपी द्वारा किया जाता है. लेकिन उपचार महंगा होने से सामान्य आदमी के वाश में नहीं है. इसलिए इस बीमारी को प्रधानमंत्री आयुष्मान योजना में शामिल करने की मांग रखी गई है.

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Poorvi Surana

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